Tuesday, 1 May 2012

भोजन बनाता हूँ मैं,भोग लगाती हैं चीटियाँ



मेरे फ़्लैट की गैलरी में बहुत दिनों से कबूतरों का बसेरा है.एक अंडा देती है,सेती है,उसमें से चूज्जे निकलते हैं.वह जाये इससे पहले ही,दूसरी अंडा देकर कब्जा जमा लेती है.पता नहीं क्यों ? 
इन दिनों चीटियाँ ने भी कब्जा जमाया हुआ है.जो भो हो इस रचना के लिए चीटियों ने ही मुझे उकसाया है.'माँ' को भी याद दिलाया है.आज प्रस्तुत है उन्हीं पर यह अभिव्यक्ति...   




रमेश यादव 

2 मई,2012

आज कल मेरे घर-किचन में कब्जा जमायीं हैं चीटियाँ 
छोटी-छोटी लाल-लाल,कई-कई झुण्ड बनाती हैं चीटियाँ,
कहाँ से आयीं हैं,पता नहीं.
दो माह से एक छत्र राज़ कायम की हैं चीटियाँ.
खाना बनाता हूँ मैं,भोग लगाती हैं चीटियाँ 
मेरे हिस्से का भी खा जाती हैं चीटियाँ 
हर सामान में लगाती हैं सेंध
मना करने पर चढ़ जाती हैं चीटियाँ 
बाज़ार से खरीद लाता हूँ ब्रेड,मेरे खाने से पहले
उसमें घुस जाती हैं चीटियाँ 
लाता हूँ दूध,बनाता हूँ चाय.
बचे हुए दूध में तैरती हैं चीटियाँ   
जब भी बैठता हूँ सोफा पर काटती हैं चीटियाँ
किससे लिए हो इज़ाज़त,हमीं से पूछती हैं चीटियाँ 
मेरी ही चीजों पर हक़ जमाती हैं चीटियाँ
बराबरी का हक़ मांगती है चीटियाँ   
डायनिंग टेबलपर भी राज़ करती हैं चीटियाँ   
क्या बताऊँ,कमरे में कहाँ-कहाँ नहीं हैं चीटियाँ,
जहाँ जाता हूँ,वहीँ मिल जाती हैं चीटियाँ 
बड़े मन से लाता हूँ 'सेम की सब्जी'
पकाने से पहले,उसमें घूस जाती हैं चीटियाँ 
दाल रखा है बंद डब्बे में,खोलता हूँ जब,उसमें से भागती हैं चीटियाँ 
जहाँ देखती हैं ठंडा,वहीँ जमावड़ा लगाती हैं चीटियाँ 
गर्मी से बिलबिलाती,किचन में शरण पाती हैं चीटियाँ 
काटती हैं ऐसे,जैसे चुभोती हैं सुइयां 
खोजता हूँ छटपटाकर,नहीं मिलती हैं चीटियाँ 
भभाता है बदन मेरा,भाग जाती हैं चीटियाँ 
 तंग चीटियों से पड़ोसी,एक दिन मंगाता है दवाई 
कहता है मुझसे,छिड़कवाइए दवाई 
मर जाएँगी सब चीटियाँ,हम बजायेंगे शहनाई     
मैं देखता हूँ,उसकी तरफ 
सोचता हूँ,एक पल 
करता हूँ इंकार
कहता हूँ 
बड़े भाग्य से आती हैं चीटियाँ 
मेरे घर में बसेरा बनाती हैं चीटियाँ   
पुरखों ने हमें दिए हैं संस्कार 
डहरी-डाडें जब भी मिले चीटियाँ
बच के निकलना,न रौदना चीटियाँ 
खुश हो जाएँगी चीटियाँ 
घर में दिखें,छिड़कना अंटा 
मन भर आशीष,देंगीं चीटियाँ 
जब भी कैम्पस से आता हूँ घर में 
इधर-उधर डोलती मिलती हैं चीटियाँ 
डालता हूँ आंटा खा जाती हैं चीटियाँ 
होकर मगन घर भर का मुआइना करती हैं चीटियाँ
कहतीं हैं 
'माँ'
मत मारना कभी चीटियाँ 
हाथी से मुकाबला करती हैं चीटियाँ 
उनसे लेना सदा सीख,उन्हीं से पढ़ना एकता का पाठ
चलती हैं कैसे झुंड में चीटियाँ 
गिर-गिर कर उठती-संभलती,चलती हैं चीटियाँ 
हार कर सत्रह बार जब निराश बैठा था,'मोहम्मद गोरी'
 जीता था अठारहवीं बार,सीख दी थीं उसे चीटियाँ
माँ 
ने कहा 
जीवन पथ पर भले गिरना-उठना,संभलना-चलना   
मगर कभी भी न मारना-रौदना चीटियाँ.

डॉ.रमेश यादव 
सहायक  प्रोफ़ेसर 
पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ,इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,मैदान गढ़ी,नई दिल्ली.    

1 comment:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया सर!


सादर